The Mauryan Empire (321–185 BCE): मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और विदेशी संबंधों का इतिहास

The Mauryan Empire (321–185 BCE): मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और विदेशी संबंधों का इतिहास

The Mauryan Empire (321–185 BCE): मौर्य साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक महान और प्रभावशाली साम्राज्य था, जिसका काल 321 ईसा पूर्व से 185 ईसा पूर्व तक माना जाता है। यह साम्राज्य भारत की राजनीतिक एकता और प्रशासनिक क्षमता के लिए प्रसिद्ध था। इसके संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य थे, जिन्होंने सत्ता पर कब्जा कर एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी। उनके बाद उनके पुत्र बिंदुसार और पौत्र अशोक ने इस साम्राज्य को और भी मजबूत किया।

चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और अशोक

चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की और नंद वंश के अंतिम शासक को हराकर शासन संभाला। उन्होंने अपने शासन को व्यवस्थित करने के लिए कुशल मंत्रियों की सहायता ली, जिनमें कौटिल्य (चाणक्य) सबसे महत्वपूर्ण थे। बिंदुसार ने अपने पिता की नीतियों को आगे बढ़ाया और साम्राज्य का विस्तार किया। सबसे प्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में साम्राज्य को चरम पर पहुंचाया। अशोक के शासनकाल में मौर्य साम्राज्य ने धार्मिक सहिष्णुता, नैतिक शासन और साम्राज्य की भलाई पर विशेष ध्यान दिया।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य भी कहा जाता है, मौर्य साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली विचारक और मंत्री थे। उन्होंने “अर्थशास्त्र” नामक ग्रंथ की रचना की, जो प्राचीन भारत का सबसे प्राचीन राजनीतिक और प्रशासनिक ग्रंथ माना जाता है। अर्थशास्त्र में राज्य शासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, न्याय और सेना की व्यवस्था पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इस ग्रंथ ने मौर्य शासन की नींव को मजबूत किया और भारतीय प्रशासनिक प्रणाली को दिशा दी।

प्रशासन, अर्थव्यवस्था और विदेश संबंध

मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत संगठित और प्रभावशाली थी। साम्राज्य को विभिन्न प्रांतों में बांटा गया था, जिनका प्रबंधन नियुक्त अधिकारियों द्वारा किया जाता था। कृषि, व्यापार और उद्योग को प्रोत्साहित किया गया, जिससे आर्थिक विकास हुआ। विदेश संबंधों में मौर्य साम्राज्य ने पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण और कूटनीतिक संबंध बनाए रखे। अशोक ने विशेष रूप से विदेशों में अपने राजदूत भेजकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया।

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अशोक का धम्म और शिलालेख

अशोक ने अपने शासनकाल में “धम्म” नामक नैतिक और धार्मिक विचारधारा को अपनाया, जो अहिंसा, सत्य, करुणा और न्याय पर आधारित थी। उसने अपने विचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए शिलालेखों पर खुदवाया, जो मौर्य साम्राज्य की नीतियों और धर्म के संदेश को उजागर करते हैं। ये शिलालेख भारतीय उपमहाद्वीप में प्रशासन और धर्म के सम्मिश्रण का अनूठा उदाहरण हैं।

मौर्य साम्राज्य ने भारतीय इतिहास में एक स्थायी छाप छोड़ी। इसका प्रभाव राजनीति, प्रशासन और धर्म में आज भी महसूस किया जा सकता है। चंद्रगुप्त से लेकर अशोक तक के शासकों ने एक मजबूत, संगठित और न्यायप्रिय शासन स्थापित किया, जिसने बाद की भारतीय शासकीय परंपराओं को आकार दिया।