How Babies Breathe: गर्भ में नहीं लेता सांस फिर भी जीवित रहता है शिशु, जानिए इस रहस्य के पीछे का विज्ञान!

How Babies Breathe: गर्भ में नहीं लेता सांस फिर भी जीवित रहता है शिशु, जानिए इस रहस्य के पीछे का विज्ञान!

How Babies Breathe: मां बनना हर महिला के लिए एक बेहद खास और भावनात्मक अनुभव होता है। गर्भावस्था के दौरान मां के मन में अपने शिशु को लेकर कई सवाल आते हैं — उनमें से एक सबसे सामान्य सवाल होता है कि मां के पेट में बच्चा आखिर सांस कैसे लेता है? दरअसल, जब बच्चा मां के गर्भ में होता है, तब वह खुद से सांस नहीं लेता, बल्कि वह मां के शरीर के जरिए ऑक्सीजन प्राप्त करता है। यह प्रक्रिया गर्भनाल (placenta और umbilical cord) के माध्यम से होती है। मां के खून से मिलने वाली ऑक्सीजन गर्भनाल के जरिये शिशु तक पहुंचती है, जिससे उसके शरीर के अंग, खासकर मस्तिष्क और दिल, सक्रिय रहते हैं।

जन्म से पहले फेफड़ों का विकास कैसे होता है?

गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ही शिशु के फेफड़े बनना शुरू हो जाते हैं, लेकिन उनका पूरा विकास तीसरे ट्राइमेस्टर यानी गर्भ के आखिरी तीन महीनों में होता है। 24 से 36 हफ्तों के बीच शिशु के फेफड़ों में ‘एल्वियोली’ नाम की छोटी-छोटी थैलियां बननी शुरू होती हैं। ये एल्वियोली फेफड़ों का सबसे अहम हिस्सा होती हैं, जिनमें ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है। अगर किसी कारणवश इन थैलियों का विकास अधूरा रह जाए, तो जन्म के बाद शिशु को सांस लेने में परेशानी हो सकती है, और उसे वेंटिलेटर या ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है।

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जन्म के बाद पहली बार कैसे सांस लेता है बच्चा?

जन्म के बाद बच्चे का वातावरण पूरी तरह से बदल जाता है। गर्भ के भीतर वह तरल पदार्थ में होता है, लेकिन बाहर आने पर उसे हवा में रहना होता है। जैसे ही बच्चा जन्म लेता है, वैसे ही उसके शरीर में हार्मोनल बदलाव और डिलीवरी के समय का शारीरिक दबाव मिलकर उसे पहली सांस लेने के लिए प्रेरित करते हैं। अधिकतर स्वस्थ नवजात शिशु 10 सेकंड के अंदर अपनी पहली सांस लेते हैं। यही पहली सांस उनके फेफड़ों को फैलाती है और वहां मौजूद तरल पदार्थ को बाहर निकालती है, जिससे शिशु का शरीर अब ऑक्सीजन लेने में सक्षम हो जाता है।

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पहली सांस का महत्व और शरीर में बदलाव

शिशु की पहली सांस केवल सांस लेना नहीं, बल्कि जीवन की शुरुआत का पहला संकेत होती है। जैसे ही वह पहली बार सांस लेता है, उसका फेफड़ा फूलता है और रक्त प्रवाह में ऑक्सीजन का प्रवाह शुरू हो जाता है। इस समय शिशु की त्वचा का रंग बदलता है, और उसकी रोने की आवाज बताती है कि वह स्वस्थ है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि उसके फेफड़े और तंत्रिका तंत्र ठीक से काम कर रहे हैं। मां के गर्भ से बाहर आने के बाद शिशु का शरीर खुद से कार्य करने लगता है, और वह दुनिया के वातावरण के अनुरूप खुद को ढालना शुरू करता है।